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अली ज़रयुन ग़ज़ल

बात मुकद्दर की है सारी, वक़्त का लिक्खा मारता है
कुछ सजदों में मर जाते हैं , कुछ को सजदा मारता है

सिर्फ हमीं है जो तुझ पर पूरे के पूरे मरते हैं
वरना किसी को तेरी आंखे , किसी को लहज़ा मारता है

दिलवाले एक दूजे की इमदाद को खुद  मर जाते है
दुनियादार को जब भी मारे दुनिया वाला मारता है

शहर में एक नए कातिल के हुस्ने सुखन के बलवे हैं
उससे बच के रहना , शेर सुनाकर बन्दा मारता है

तेरी क्या औकात री दुनिया ,तू और मेरे मुंह आए
मैं तो चीर के रख डालूं  , पर यार का बोला मारता है

इश्क़ के हाथों मरके देखो ऐसा अनोखा कातिल है
ज़िंदा करके रख देता है , इतना सोहणा मारता है

अब उश्शाक़ का मेला हो तो मजनूँ को भी ले आना
आशिक़ तो चाहे जैसा है पर नारा अच्छा मारता है

वो तो 'अली ज़रयून' है भाई उसकी गली का बच्चा भी
बात ज़रा सी ग़लत करो तो मुंह पर मिसरा मारता है

अली जरयून

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