सियासत का कोई चेहरा नहीं है
वो झुक जाता है जो सीधा नहीं है
वो घर भी कब्र जैसे हैं कि जिनका
किसी दर से कोई रिश्ता नहीं है
इधर दानाओं को शिकवा है मुझसे
ये मुर्गा आजकल फंसता नहीं है
लहू ,की बात थोड़ी मुख़्तलिफ है
वगर्ना और कुछ सस्ता नहीं है
हरिक दरिया के लब पर रेत देखी
कोई सैराब हो , ऐसा नहीं है
वहाँ की खिड़कियाँ कब मानती हैं
कि उस घर से मेरा रिश्ता नहीं है
जहाँ सबसे ज़ियादा है ज़रूरी
कोई बम उस जगह फ़टता नहीं है
वफाओं पर तुम्हारी शक नही , पर
मयंक , अपनी कसम देता नहीं है
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